Saturday, March 21, 2020
Tuesday, March 17, 2020
उत्तराखंड के महान व्यक्तित्व और उनके उपनाम 😍
जय गुरुदेव उत्तराखंड के महान व्यक्तित्व और उनके उपनाम Mission-2021-22
1-उत्तराखंड का गांधी इंद्रमणि बडोनी जी को कहा जाता है
2-गढ़वाल का वेदव्यास यशोधर मठपाल जी को कहा जाता हैl
3-उत्तराखंड में मैती कल्याण सिंह रावत जी को कहा जाता हैl
4-गढ़वाल का जनरल डायर चक्रधर जुयाल को कहा जाता हैl
5-ब्लैक बेल्ट फास्टर डेन की उपाधि कमला रावत को दी गई हैl
6-स्टांग मैन ऑफ इंडिया की उपाधि फैयाज अहमद अंसारी को दी गईl
7-राम बहादुर छेत्री को चाइना बोल के नाम से जाना जाता हैl
8-तिलोक सिंह बसेड़ा को आयरन बॉल ऑफ इंडिया के नाम से जाना जाता हैl
9-जसपाल राणा को गोल्डन ब्वॉय की उपाधि दी गई है
10-माधव सिंह भंडारी को गर्व भंजक की उपाधि दी गई हैl
11-गर्व भंजन की उपाधि महिपति सहा को दी गई हैl
12-वीर चंद्र सिंह गढ़वाली की उपाधि चंद्र सिंह भंडारी जी को दी गई है।
13-बीसी साहब दर्पण सिंह नेगी का उपनाम हैl
14- गढ़वाल का दानवीर घनानंद खंडूरी जी को कहा जाता हैl
15-चिपको वूमेन गोरा देवी को कहा जाता है।
16-गोरा ब्राह्मण जिम कार्बेट को कहा जाता हैl
17-पी बी काटले को उत्तराखंड का भगीरथ कहा जाता हैl
18-शिवदत्त जोशी जी को कुमाऊ का बैरन कहा जाता है।
19-विद्यासागर नौटियाल जी को गढ़वाल का प्रेमचंद्र कहा जाता हैl
20-हेमवती नंदन बहुगुणा को गढ़वाल का चंदन और पर्वत पुत्र कहा जाता हैl
21- किशन सिंह को राय बहादुर की पदवी से नवाजा गया हैl
22-टिंचरी माई ठगुली देवी या दीपा देवी को कहते है।
23-सरला बहन का मूल नाम कैथरीन हेलीमन थाl
24कप्फू चौहान को गढ़वाल का राणा प्रताप कहा जाता हैl
25-तीलू रौतेली को गढ़वाल की झांसी की रानी कहा जाता है
26-गढ़वाल की नाक काटने वाली रानी रानी कर्णावती को कहा जाता हैl
27-कुमाऊ की झांसी की रानी जिया रानी को कहा जाता हैl
28-कंपेनियन ऑफ इंडियन एंपायर पंडित नैन सिंह रावत जी को कहा जाता है
29-श्रीमान की उपाधि मोहन लाल मेहता जी को दी गई हैl
30-उत्तम दास को ढोल सागर के ज्ञाता की उपाधि मिली हैl
31-कल्याण चंद्र को घुमाओ का कुंभकरण कहा जाता हैl
32- फ्रेडरिक विल्सन को पहाड़ी विल्सन कहा जाता है
33-तारा दत्त गैरोला को गढ़वाल का महर्षि और गढ़वाल जन जागरण का पितामह कहा जाता हैl
34- पुरिया नैथानी को उत्तराखंड का चाणक्य कहा जाता है
35-दद्दा चंद्र सिंह राणा का उपनाम हैl
36-विश्वरत्न की उपाधि शशिधर शर्मा जी को दी गई हैl
37-महीधर शर्मा डंगवाल जी को धर्माधिकारी की उपाधि दी गई है।
38-गढ़वाली बच्चू लाल भट्ट जी का उपनाम हैl
39-सुरेंद्र सिंह भंडारी को उत्तराखंड एक्सप्रेस कहा जाता हैl
40-गौरी दत्त पांडे को गौर्दा कहा जाता है
41-गिर्दा गिरीश तिवारी जी को कहा जाता है।
42-बद्री दत्त पांडे को कुमाऊं केसरी कहा जाता हैl
43-उत्तराखंड के वृक्ष मानव के नाम से विश्वेश्वर दत्त सकलानी जाने जाते हैं।
44-पहाड़ का गांधी जसवंत सिंह बिष्ट जी को कहा जाता हैl
45-कुमाऊ का गांधी देवकीनंदन पांडे जी को कहा जाता हैl
46-अंग्रेजी संत माधव आशीष को कहा जाता हैl
47-जयानंद आर्य पथिक जया नंद भारती का नाम है।
48-कथा शिल्पी साहित्यकार शैलेश मटियानी जी को कहा जाता है।
49-गढ़वाल का हातिमताई कुंवर सिंह नेगी जी को कहा जाता हैl
50-भाबर का विश्वकर्मा रैमजे को कहा जाता हैl
51-अल्मोड़ा के बेटी पाकिस्तान की बहू आईरिस पंत को कहा जाता हैl
52-इनसाइक्लोपीडिया ऑफ उत्तराखंड और चारण शिव प्रसाद डबराल को कहा जाता हैl
53-गोसाई दत्त या प्रकृति प्रेमी कवि सुमित्रानंदन पंत जी को कहा जाता है।
54-दैवेज्ञ की उपाधि मुकुंदन राम बड़थ्वाल जी को दी गई है!
55-लोकनाथ या लोग रत्न पंथ गुमानी कवि को कहा जाता हैl
56-कुमाऊ का चाणक्य हर्ष देव जोशी जी को कहा जाता हैl
57-किंग ऑफ कुमाऊं हेन्री रैम्म जी को कहा जाता हैl
58-विकास पुरुष नारायण दत्त तिवारी जी को कहा जाता हैl
59-धरतीपुत्र या हिम पुत्र mo3 नंदन बहुगुणा जी को कहा जाता है।
60-आजाद श्रीधर कीमोटी जी को कहा जाता हैl
61-दूसरी राय बहादुर की उपाधि सोहन सिंह जीना जी को मिली थीl
62-देहरादून का सुल्तान महावीर त्यागी को कहा जाता हैl
63-काली कुमाऊं का शेर हर्षदेव औली जी को कहा जाता है।
64-बैडमिंटन क्वीन मधुमिता बिष्ट जी को कहा जाता हैl
65-एवरेस्ट ट्विंस तासी और नुंगसी मलिक को कहा जाता है।
66-जोहर के जोहरी शेर सिंह पांगती जी को कहा जाता है।
67-द किंग ऑफ हर्षित फ्रेडरिक को कहा जाता है
68-शिवानी गौरा पंत जी को कहा जाता हैl
69-उत्तराखंड की कोकिला तथा उत्तराखंड की तीजन बाई कबूतरी देवी को कहा जाता हैl
71- गढ़वाली चित्रकला का जन्मदाता मोलाराम तोमर को कहा जाता है
72- जनकवि गिरीश तिवारी को कहा जाता हैl
Monday, March 16, 2020
ऑपरेशन मुक्ति
उत्तराखंड पुलिस बाल भिक्षावृत्ति को रोकने के लिए एक बड़ा कदम उठाया है जिसके लिए उन्होंने ऑपरेशन मुक्ति नाम से एक अभियान चलाया है जिसका उद्देश्य भिक्षा नहीं शिक्षा दें।
अभी तक उत्तराखंड में इस अभियान की फल स्वरूप 700 से अधिक बच्चों को शिक्षा दे दी गई है इस अभियान के द्वारा लुकड नाटक करके और लोगों को समझाया जा रहा है कि सार्वजनिक स्थान जैसे विद्यालय रेलवे स्टेशन सिनेमाघर आदि ऐसे स्थानों में बच्चों को बचाना दी जाए और एक ऐसा मापदंड तैयार किया जा रहा है जिसमें बच्चों को चिन्हित किया जा रहा है कि वह क्यों भीख मांग रहे हैंl
उत्तराखंड पुलिस इसमें बाल भीक्षार्थी के परिवार वालों से उनको शिक्षित करने के लिए बात कर रही है और उन लोगों को चिन्हित कर रही है जो अपने निजी लाभ के लिए छोटे-छोटे बच्चों से भीख मांग आते हैं ऐसे लोगों की कानूनी कार्रवाई की जा रही हैl
शिक्षा के क्षेत्र में उत्तराखंड पुलिस के द्वारा जहां एक सराहनीय कदम हैl
Saturday, March 14, 2020
उत्तराखंड में जारी हुए डाक टिकट
जय गुरु देव उत्तराखंड से सम्बन्धित डाक टिकट mission 2021-22
1-पंडित गोविंद बल्लभ पंत का नाम का डाक टिकट 1965 में 15 पैसे का जारी हुआ इसके बाद 1988 में गोविंद बल्लभ पंत के नाम का डाक टिकट 60 पैसे का जारी हुआl
2-भारतीय सर्वेक्षण विभाग के नाम का डाक टिकट 1967 को 15 पैसे का जारी किया गयाl
3-स्वामी रामतीर्थ के नाम का डाक टिकट 1966 को 15 पैसे का जारी किया गयाl
4-उत्तराखंड राज्य पक्षी मोनाल के नाम का डाक टिकट 1975 को ₹2 का जारी किया गयाl
5-उत्तराखंड के राज्य वृक्ष बुरास के नाम का डाक टिकट 1977में 50 पैसे का जारी हुआ!
6-भारतीय सैन्य अकादमी के नाम का डाक टिकट 1982 में 50 पैसे का जारी किया गयाl
7-उत्तराखंड के राजकीय पुष्प ब्रह्मकमल के नाम का डाक टिकट 1982 को 2.85₹ का जारी किया गयाl
8-आदि गुरु शंकराचार्य के नाम का डाक टिकट 1989 में 60 पैसे का जारी किया गयाl
9-श्री राम शर्मा आचार्य के नाम का डाक टिकट 1991 में ₹1 का जारी किया गयाl
10-चंद्र सिंह गढ़वाली के नाम का डाक टिकट 23 अप्रैल 1994 को ₹1 का जारी किया गयाl
11-राष्ट्रीय इंडियन मिलिट्री कॉलेज के नाम का डाक टिकट 1997 को ₹2 का जारी किया गयाl
12-रूड़की विश्वविद्यालय के नाम का डाक टिकट 1997 को ₹8 का जारी किया गयाl
13-देहरादून रेल के नाम का डाक टिकट 2000 को ₹15 का जारी किया गयाl
14-केदारनाथ धाम के नाम का डाक टिकट 2001 में ₹4 का जारी किया गयाl
15-गुरुकुल कांगड़ी विश्वविद्यालय हरिद्वार के नाम का डाक टिकट 2002 में ₹5 का जारी किया गयाl
16-बद्रीनाथ धाम के नाम का डाक टिकट 2003 में ₹5 का जारी किया गयाl
17-कैम्पटी जलप्रपात के नाम का डाक टिकट 2003 में ₹5 का जारी किया गया।
18-जिम कार्बेट के नाम का डाक टिकट 1976 को 25 पैसे का जारी किया गयाl
19- राहुल सांकृत्यायन के नाम का डाक टिकट 1993 में 100 पैसे का जारी किया गयाl
20-रूपकुंड झील के नाम का डाक टिकट का 2006 में ₹5 का जारी किया गयाl
21-नंदा देवी राजजात यात्रा के नाम का डाक टिकट 2014 को ₹2 का जारी किया गयाl
22-गढ़वाल रेजीमेंट की तीसरी बटालियन के नाम का डाक टिकट 19 नवंबर 2016 को ₹5 का जारी किया गया
23-कुमाऊं रेजिमेंट की तीसरी बटालियन के नाम का डाक टिकट 23 अक्टूबर 2017 को ₹5 का जारी किया गयाl
24-हेमवती नंदन बहुगुणा के नाम का डाक टिकट 25 अप्रैल 2018 को ₹5 का जारी किया गयाl
25-गोमुख के नाम का डाक टिकट 1983 को जारी किया गयाl
26-स्वामी श्रद्धानंद के नाम का डाक टिकट 1970 को 20 पैसे का जारी किया गयाl
27-नैन सिंह रावत के नाम का डाक टिकट 2004 को ₹5 का जारी किया गयाl
28-सुमित्रानंदन पंत के नाम का डाक टिकट 23 दिसंबर 2015 को ₹5 का जारी किया गयाl
29-कार्बेट नेशनल पार्क के नाम का डाक टिकट 15 सितंबर 1986 को एक रुपए जारी किया गयाl
30-गढ़वाल राइफल और गढ़वाल स्काउटस के नाम का डाक टिकट 5 मई 1987 को 100 पैसे का जारी किया गयाl
एक मां ऐसी भी:-टिंचरी माई कहानी
एक मां ऐसी भी
रात के 3:00 बज रहे हैं नींद नहीं आ रही थी तो किताब खोली कुछ लोगों के बारे में पढ़ते पढ़ते यह सोचा कि कुछ कहानियां आप लोगों के साथ साझा की जाएl जैसा की कहानी का शीर्ष है एक मां ऐसी भी! दोस्तों यह कहानी है एक ऐसी महिला की जिसने अपने जीवन में कुछ नहीं पाया और लोगों के हित मे अपना जीवन समर्पित कर दिया।
अब बडते कहानी की और जानते हैं वह महिला कौन थीl यह कहानी है एक अनाथ लड़की की समाज के लिए मां बनने की कहानी जिस तरीके से मां अपने बच्चों को बुरी चीजों से दूर रखती है उसी तरीके से एक मामूली सी महिला जिसका नाम दीपा देवी था उसे लोगों ने जिसे लोगो ने टिंचरी माई बना दिया।
टिंचरी माई का मूल नाम दीपा नौटियाल था जिनका जन्म 1917 में मंज्यूर ग्राम पौड़ी गढ़वाल में हुआ था 2 वर्ष की आयु में उनकी मां का देहांत हो गया कुछ वर्षों बाद उनके पिता का भी देहांत हो गया उनके चाचा ने उनका पालन पोषण किया इस समय समाज में बाल विवाह की प्रथा थी जिस कारण 7 वर्ष की अल्पायु में उनका विवाह अंग्रेजी सेना में कार्यरत एक सैनिक गणेशराम के साथ करा दिया गया जो उनसे उम्र में 17 वर्ष बड़ा था परंतु गणेश राम अच्छे व्यक्तित्व वाला व्यक्ति था वह उनका बहुत ख्याल रखता था दुर्भाग्यवश जब दीपा नौटियाल जब 19 वर्ष की थी तो उनके पति का देहांत हो गया पति के देहांत के बाद उन्हें कुछ पैसे मिले परंतु उसके बाद ससुराल वाले उनसे दुर्व्यवहार करने लगे जिस कारण वे लहौर जाकर एक आश्रम में साध्वी का जीवन व्यतीत करने लगेl उन्होंने अपना नाम परिवर्तित कर इच्छा गिरी माई रख दियाl समाज में फैली कुप्रथाओं के प्रति वह लोगों में चेतना फैलाने लगे और खुद अनपढ़ होने के बाद भी वह शिक्षा के लिए लोगों को जागृत करने लगे।
1947 वह हरिद्वार आई उनका वहां साधु से बोलना हो गया क्योंकि साधु नशे की अवस्था में थे इसके बाद भी भाबर सिंगडी गांव कोटद्वार आ गई और एक कुटिया बनाकर रहने लगी। इस वक्त यहां महिलाओं को पानी की समस्या बहुत अधिक थी जिस कारण वे दिल्ली प्रधानमंत्री नेहरू जी के आवास के बाहर बैठ गई जैसे ही नेहरू जी की कार आए तो वह कार के आगे कूद गई और बोली या तो जल दो या गाड़ी चला दो मेरे ऊपर जब नेहरू जी ने उन्हें देखा और उनकी समस्या को जाना तो बोला माई आपकी समस्या दूर हो जाएगी जब नेहरू जी ने उनका हाथ पकड़ा तो उन्हें काफी अधिक बुखार था और उनके इलाज की व्यवस्था की परंतु उन्होंने इलाज करने से मना कर दिया और वह लौट आई उनके लौटने तक नेहरू जी ने वहां जल की व्यवस्था करा दी परंतु दुर्भाग्यवश वहां के पटवारी ने उनकी कुटिया तोड़ दी और का यह गैर कानूनी भूमि पर है माय वहां से चली गई और मोटाढाक के मास्टर मोहन सिंह के वहां चली गई जिन्होंने माय के लिए एक कमरे की व्यवस्था की मायने उनके साथ मिलकर और चंदा करके एक विद्यालय की स्थापना की जिसका नाम उन्होंने अपने स्वर्गवासी पति के नाम पर रखा उसके बाद भी 1955 56 में पौड़ी आ गई इस वक्त यहां नसे का प्रकोप काफी अधिक था जिस कारण युवा वर्ग और महिलाओं को इसका बहुत अधिक सामना करना पड़ता था इस वक्त मित्तल नाम के एक व्यापारी की टिंचरी नाम कि शराब कि कम्पनी थी जिसकी शिकायत मायने वहां के कलेक्टर से की कलेक्टर माय के साथ दुकान में आया परंतु उसने कुछ नहीं किया गुस्से में आकर माई ने दुकान में आग लगा दी जिस कारण जिस कारण उनका नाम टिंचरी माई पडा। 19 जून 1992को इनकी मृत्यु हुईI
उत्तराखंड राज्य के प्रतीक चिन्ह:-संपूर्ण जानकारी
जय गुरु देव उत्तराखंड राज्य प्रतीक चिन्ह mission 2021-22
उत्तराखंड राज्य का गठन 9 नवंबर 2000 को हुआ इस समय इसका नाम उत्तरांचल रखा 1 जनवरी 2007 को इसका नाम परिवर्तन कर उत्तराखंड किया गया उत्तराखंड शासन ने उत्तराखंड राज्य चिन्ह का निर्धारण 2001 में किया थाl।
उत्तराखंड राज्य चिन्ह- राज्य के शासकीय कार्यों में राज्य चिन्ह का प्रयोग किया जाता है उत्तराखंड के राज्य चिन्ह गोलाकार मुद्रा में है जिसमें गंगा की 4 लहरें 3 पर्वत श्रृंखलाएं अशोक की एक लाट जिसके नीचे सत्यमेव जयते लिखा गया हैl
Note- सत्यमेव जयते मुंडकोपनिषद से लिया गया हैl
उत्तराखंड राज्य पशु- हिमालय का मस्क डिअर के नाम से प्रसिद्ध कस्तूरी मृग उत्तराखंड का राज्य पशु है जिसका वैज्ञानिक नाम मास्कस काइसोगास्टर है। यह 3600 से 4400 मीटर कि ऊँचाई में केदारनाथ फूलों की घाटी व उत्तरकाशी में बहुत अधिक मात्रा में पाया जाता है कस्तूरीमृग भुरे रंग तथा उसमें काले पीले रंग के धब्बे होते हैंl कस्तूरी मृग के पैरों में चार खुर दो बाहर निकले निकले दांत और लगभग 20 इंच लंबा होता है।
कस्तूरी मृग की औसतन आयु 20 वर्ष होती है तथा उत्तराखंड में इसकी 4 प्रजातियां पाई जाती है जो हर 6 माह में गर्भ धारण करती है कस्तूरी मृग हिमाचल प्रदेश सिकिकम और कश्मीर में भी काफी अधिक मात्रा में पाए जाते हैं नर मृग से 3 वर्ष के अंतराल में 30 से 45 ग्राम कस्तूरी प्राप्त हो सकती है औषधि उद्योगों में कस्तूरी का प्रयोग दमा मिर्गी हृदय संबंधी रोगों की दवाई बनाने के लिए किया जाता है।
कस्तूरी मृग के संरक्षण के लिए 1972 में केदारनाथ वन्य जीव विहार की स्थापना की गई जो रुद्रप्रयाग जनपद में स्थित हैl महरूडी कस्तूरी मृग अनुसंधान की स्थापना 1977 में पिथौरागढ़ और बागेश्वर बॉर्डर में की गई 1988 अस्कोट वन्य जीव विहार की स्थापना पिथौरागढ़ जनपद में की गई है तथा 1982 में काचुंला खर्क जिसका उद्देश्य कस्तूरी मृग का प्रजनन बढ़ाना है इसकी स्थापना चमोली जनपद में की गईl 2005 के आंकड़े के अनुसार इनकी संख्या उत्तराखंड में 279 थीl
Note- कस्तूरी मृग का मुख्य भोजन केदार पाती हैl इसे संरक्षित पशु 1972 में घोषित किया गया थाl
उत्तराखंड राज्य पुष्प- स्थानीय भाषा में कौल पदम और महाभारत के वन पर्व में सौगंधित पुष्प के नाम से प्रसिद्ध ब्रह्मा कमल उत्तराखंड का राज्य पुष्प है जो और 4000 मीटर से 6000 मीटर की ऊंचाई में फूलों की घाटी केदारनाथ व पिंडारी ग्लेशियर में अत्यधिक मात्रा में पाया जाता हैl इसके पौधे की ऊंचाई 70 से 80 सेंटीमीटर होती है इसमें भूरे रंग के फूल जुलाई से सितंबर माह में लगते हैं इसकी उत्तराखंड में 24 प्रजातियां तथा विश्व में 210 प्रजातियां पाई जाती हैl
Note- ब्रह्म कमल के नाम का डाक टिकट 1982 में 2.85 पैसे का जारी किया गयाl ब्रह्मा का ऐसटेरसी कुल का पौधा है इसका वैज्ञानिक नाम सोसूरिया अबवेलेटा है। यह पुष्पा केदारनाथ में शिव के चरणों पर अर्पित किया जाता हैl
उत्तराखंड राज्य वृक्ष- बसंत के मौसम में उत्तराखंड के राज्य वृक्ष बुरांश रंग बिरंगे फूल लगते हैं जिसमें 1500 से 4000 मीटर की ऊंचाई में चटक लाल तथा इससे ऊपर बढ़ने पर इन फूलों का रंग गहरा लाल तथा हल्का लाल मिलता है तथा 11000 फीट की ऊंचाई में इन फूलों का रंग सफेद मिलता है इस का वनस्पतिक नाम रोडोडेन्डान अरबोरियम है। यह एक सदाबहार वृक्ष है इसमें औषधि गुण भी पाए जाते हैं बुरास वृक्षों की ऊंचाई 20 से 25 फिट होती है इसकी लकड़ी बहुत मुलायम होती है इसका ज्यादातर प्रयोग ईधन तथा इसके पत्तों का प्रयोग खाद बनाने में किया जाता है 1974 में इसे संरक्षित व्यक्ति घोषित किया गया है।
Note- बुरास वृक्ष का डाक टिकट 1977 में 50 पैसे का जारी हूआ।
उत्तराखंड राज्य पक्षी- 2500 से 5000 मीटर की ऊंचाई में उत्तराखंड कश्मीर असम तथा नेपाल पाया जाने वाला हिमालय मयूर के नाम से प्रसिद्ध पक्षी मोनाल उत्तराखंड राज्य का राज्य पक्षी हैl
स्थानीय भाषा में इसे मल्याल या मुनार कहते हैं यह मादा होता है नीले काले हरे आदि रंगों का मिश्रित इस पक्षी की पूंछ हरी होती है इसकी नर प्रजाति डफिया होती है जिसके सर पर मोर की तरह रंगीन कलगी होती हैl इसका आहार आलू तथा कीट है मासं तथा खाल के लिए इसका शिकार काफी अधिक होता हैl
Note- मोनाल के नाम का डाक टिकट 1975 में ₹2 का हुआ थाl
उत्तराखंड राज्य खेल- 2011 में फुटबॉल को उत्तराखंड का राज्य खेल घोषित किया गयाl राम बहादुर छेत्री को चाइना बाल कहा जाता है तथा तिलोक सिंह बसेड़ा को आयरन बाल ऑफ इंडिया कहा जाता है दोनों का संबंध फुटबॉल खेल से हैl
उत्तराखंड राज्य वाद्य यंत्र- उत्तराखंड राज्य का वाद्य यंत्र ढोल है जिसे 2015 में घोषित किया गयाl
Note-
मुख्यमंत्री हरीश रावत ने राज्य वाद्य के चयन के लिए छह सदस्यीय कमेटी गठित की। इसमें साहित्यकार एवं गीतकार जुगल किशोर पेटशाली, प्रसिद्ध लोकगायक चंद्रसिंह राही व प्रीतम भरतवाण, ढोल सागर विशेषज्ञ उत्तमदास, पत्रकार राजीव नयन बहुगुणा, भातखंडे संगीत महाविद्यालय के प्रधानाचार्य योगेंद्र भ्ाडारी और संस्कृति विभाग के समन्वयक एसएल ममगांई को शामिल किया गया। श्री भंडारी को कमेटी के सदस्य सचिव की जिम्मेदारी सौंपी गई,
उत्तराखंड राज्य गीत- हेमंत बिष्ट द्वारा लिखित उत्तराखंड देव भूमि मातृभूमि शत शत वंदन अभिनंदन को 2016 में उत्तराखंड का राज्य गीत घोषित किया गया जिसके स्वर नरेंद्र नेगी तथा अनुराधा निराला जी के हैंl
उत्तराखंड राज्य तितली-2016 को कॉमन पीकॉक को उत्तराखंड राज्य तितली घोषित किया गयाl
Note- उत्तराखंड में 500 से अधिक तितलियां पाई जाती है कामन पिकाक तितली उत्तराखंड के अलावा पंजाब, हरियाणा, हिमाचल, अरुणाचल प्रदेश, पूर्वी मेघालय में पायी जाती है। प्रदेश के ऊंचाई वाले क्षेत्रों में भी ये तितलियां पाई जाती हैं। मोर की गर्दन की तरह रंग होने के कारण इसका नाम कामन पीकाक पड़ा है। वन्यजीव विशेषज्ञों के मुताबिक 1966 में इस लिम्का बुक आफ रिकार्ड की तरफ से सबसे सुन्दर तितली का खिताब दिया गया था। कामन पीकाॅनक का जीवन-काल 30 से 35 दिनों का होता है। आमतौर पर मार्च से लेकर अक्टूबर महीने के दौरान यह तितली दिखाई देती है कामन पीकाक तितली की खास बात ये है यह टिमरू नाम के पेड़ पर ही अपने अंडे देती है। इस पेड़ का औषधीय महत्त्व के साथ धार्मिक महत्त्व भी है। भीमताल स्थित बटर फ्लाई संग्रहालय का संचालक पीटर स्मैटाचक कहते हैं कि कामन पीकाक के पंखों में पाया जाने वाला हरा और नीला रंग वास्तविक नहीं होता है बल्कि पंख पर सूर्य की रोशनी पड़ने के कारण यह ऐसा दिखाई देता है।
उत्तराखंड राज्य की भाषा-उत्तराखण्ड की भाषाएँ पहाड़ी भाषाओं की श्रेणी में आती हैं। उत्तराखण्ड में बोली जाने वाली भाषाओं को दो प्रमुख समूहों में विभाजित किया जा सकता है: कुमाऊँनी और गढ़वाली जो क्रमशः राज्य कुमाऊँ और गढ़वाल मण्डलों में बोली जातीं हैं। इन दोनों भाषाओं में संस्कृत के अनेकों शब्दों की उपलब्धता से इन्हे संस्कृत से विकसित समझा जाता है। जौनसारी और भोटिया दो अन्य बोलियाँ, जनजाति समुदायों द्वारा क्रमशः पश्चिम और उत्तर में बोली जाती हैं।
लेकिन राज्य की सबसे प्रमुख भाषा हिन्दी है। यह राज्य की आधिकारिक और कामकाज की भाषा होने के साथ-साथ अन्तरसमूहों के मध्य संवाद की भाषा भी है।
राज्य की दूसरी प्रमुख राजभाषा संस्कृत है। उत्तराखंड में संस्कृत को 2010 में द्वितीय राजभाषा का दर्जा प्राप्त है।
Friday, March 13, 2020
पिथौरागढ़ जनपद
जय गुरु देव पिथौरागढ़ का परिचय Mission:-2022
जनपद का गठन:-24 February 1960
Note:- अल्मोड़ा के भारत तिब्बत नेपाल बॉर्डर वाले काप्ती खंड को अलग करके 24 फरवरी 1960 को इस जिले की स्थापना की गई इसका मुख्यालय पिथौरागढ़ नगर में स्थापित किया गया 15 सितंबर 1997 को इसकी तहसील चंपावत को अलग कर नया जिला बनाया गया l
आकार-यह जिला समुद्र तल से 1636 मीटर की ऊंचाई पर शोर घाटी में कटोरा नुमा आकृति मे बसा हैl पिथौरागढ़ चार पर्वतों से घिरा हैl
उपनाम:-जौहरी घाटी, मिनी कश्मीर वल्दिया का देश,सोर क्षेत्र, वीरों की धरती पठारी गढ
कथन- सोर के उपनाम में सर्वप्रथम मत श्रीपद्मा दत्त पंत जी का था! बम के लोग(पश्चिम नेपाल) मूल रूप से सोराड(सौराष्ट्र)के थे अतः इसी से सोर क्षेत्र की उत्पत्ति हुई है!
प्रमाणित मत:- सोर शब्द की उत्पत्ति का प्रमाणित मत सर या सरोवर के विकसित रूप से है!
Note:- मुनस्यारी को जोहरी क्षेत्र का प्रवेश द्वार कहते हैं तथा बाज बहादुर चंद्र के ताम्रपत्र में पिथौरागढ़ को वल्दिया का देश कहा गयाl
नामकरण:-पिथौरागढ़ पिठौरागढ़
मतो के अनुसार- पिथौरागढ़ के संबंध में कई इतिहासकारों ने अपने मत रखें!
१-मदन चंद भट्ट के अनुसार कत्युरी राजा प्रीतम देव(पिथौराशाही)ने इसे बसाया हुआ 1398 में अभेघ किला बनाया जिसे पृथ्वी गढ़ का किला कहा जाता था इसी कारण इसका नाम पिथौरागढ़ पड़ा!
२-एटकिंसन का मत इनके अनुसार गोरखा शासक परी गोसाई यहाँ कई गढ़ बनाएं जिस कारण इसका नाम पिथौरागढ़ पड़ा! डॉ राम सिंह का मत की चंद्र काल में किलो को बुंगा कहा जाता था और गोरखा काल में किलो को गढ कहा जाता था अतः गोरखा शासनकाल में यहां काफी किले बने जिस कारण इसे पिथौरागढ़ कहा गया!
कुछ महत्वपूर्ण तथ्य:-
1-मदन चंद्र भट्ट जी की पुस्तक:-हिमालय का इतिहास
2-एटकिंसन की पुस्तक :-हिमालय डिस्ट्रिक्ट गजेटियरस
नोट-1882-86 तक १४ खंडों में प्रकाशित हिमालय क्षेत्र का पहला गैजेटियर्स था!
3-डॉ राम सिंह की पुस्तक:-सोर के अतीत(2007)
4-प्रीतम देव:- कत्युरी वंश के 47 वें राजा प्रीतम देव थे जिनकी पत्नी का नाम जिया रानी था इन्हें ही कुमाऊ की झांसी की रानी कहा जाता है! इनका शासनकाल 1380 से 1400 तक का था!
5-जियारानी:- इनका वास्तविक नाम मौला देवी था इनके पिता का नाम मायापुर (हरिद्वार) नरेश अमरदेव पुडीर था!इन्हें पिंगला प्यौंला भी कहा जाता है! 1398 मे तैमूर लंग ने उत्तराखण्ड पर आक्रमण किया था इस समय राजा ब्रह्मदेव थे! ब्रह्मदेव प्रीतम देव व उनकी पहली पत्नी का पुत्र था! मालूशाही प्रीतम देव व जिया रानी का पौत्र था जिसका वर्णन जागरण में मिलता है!
राजुला मालूशाही की प्रेम कहानी- कत्यूरी वंश की राजधानी बैराठ (चौखुटिया) थी इस समय यहां का राजा दुलाशाह था इनकी कोई संतान नहीं थी जिस कारण वह काफी परेशान रहते थे लोगों की सलाह पर वह संतान प्राप्ति के लिए बागनाथ मंदिर (बागेश्वर) गए जहां उनकी मुलाकात सुनपत शौक से हुई। वह भी नहीं संतानहीन थे दोनों ने यह निर्णय लिया की अगर हमारे वहां लड़का लड़की हुई तो हम उनका विवाह करा देंगे सौभाग्य बस दूलाशाह के वहां पुत्र रूप में मालूशाही का जन्म हुआ और सुनपत शौक के वहां राजुला का पुत्री रूप में जन्म हुआ जब दुलाशाह ने जब मालूशाही की कुंडली ज्योतिष को दिखाएं तो ज्योतिष ने बताया कि मालूशाही बहुरंगी है इसका विवाह किसी नौरंगी लड़की के साथ उसका विवाह करा दिया जाए वरना यह 5 दिन के अंदर मर जाएगाlतब दुलाशाह ने सनुपत शौक के वहां संदेश भेजा और विवाह का प्रस्ताव रखाl तो शौक बहुत खुश हुआ और उसने अपनी पुत्री का विवाह मालूशाही के साथ कर दिया परंतु दुर्भाग्यवश कुछ समय बाद दूला शाह की मृत्यु हो गई और लोगों ने राजुला को भाग्यहीन मानकर यह अफवाह फैला दी कि शादी के तुरंत बाद यह अपने ससुर को खा गईl समय बीतता गया राजुला और मालूशाही दोनों जवान होने लगे परंतु कभी मालूशाही और राजुला को नहीं बताया गया कि उनका विवाह हो चुका हैl राजुला के सौंदर्य के चर्चे पूरे चारों ओर फैलने लगेl कहावत के अनुसार एक बार राजुला ने अपनी मां से पूछा सबसे प्यारा राजा कौन सा है तो उन्होंने जवाब दिया रंगीला बैराट का राजा मालूशाही तो राजुला ने कहा मां मेरा विवाह मालूशाही के साथ ही करानाl इसके बाद राजुला के सपने में मालूशाही आया और मालूशाही के सपने में राजूआ आई और कहा तुम मुझे लेने शौका क्षेत्र आओ। मालूशाही ने निर्णय लिया कि वह राजुला से मिलने जाएगा और वहां राजुला के लिए हुंड राजा विकखीपाल का रिश्ता आया उसने सुनपत से कहा यदि मेरा विवाह राजुला के साथ नहीं हुआ तो वह शौक क्षेत्र को नष्ट कर देगाl और रात में राजूला ने अपनी मां से बैराठ का रास्ता पूछा परंतु मा ने उसे कुछ नहीं बताया तब राजुला ने हीरे की अंगूठी लेकर बैराठ की ओर बढ़ी और वहां मालूशाही ने अपनी मां के सामने राजुला और अपने विवाह का प्रस्ताव रखा परंतु मां ने इस प्रस्ताव को नही माना जिस कारण मालूशाही ने नशीली जड़ी बूटी खाली जिसके प्रभाव से वह बेहोश हो गया जब राजुला वहां आए और उसको उठाने की कोशिश की परंतु वह नहीं उठाl राजुला ने उसे हीरे की अंगूठी पहनाई और एक पत्र लिखा और वहां से चल पड़ी इस पत्र में लिखा थाl मेरे प्रीतम मालूशाही मैं आपसे मिलने आई परंतु आप नहीं उठे मेरे घरवाले ने मेरा विवाह हुंड राजा से करा रहे हैं यदि आपको मिलना है तो आप वहां आकर मुझे ले जाए जब मालूशाही ने यह पत्र पढ़ा वह बहुत दुखी हुआl और बाबा गोरखनाथ की शरण में बाबा जी ने उन्हें भिक्षु बनकर हुंड राज्य में जाने को कहा मालूशाही भिक्षु बनकर हुंड राज्य में गए और उनकी मुलाकात राजुला से हुई राजुला से मिलने के बाद उन्होंने उन्हें बताया कि मैं तुम्हें लेने आया हूं और वह भिक्षु रूप में थे जिस कारण उन्हें रात दरबार मैं रख लिया गया क्योंकि बाबा गोरखनाथ द्वारा उन्हें कुछ शिक्षा भी प्राप्त थी परंतु हुंड राजा विकखीपाल को मालूशाही पर संदेह हो गया और एक बार उन्होंने राजुला व मालूशाही को साथ में देख लियाl और 1 दिन मालूशाही की खीर में जहर मिला दिया जिससे मालूशाही की मृत्यु हो गई जब यह संदेश राजुला को मिला तो वह बेहोश हो गईl मालूशाही अपनी मां के सपने में आए और बोले मैं मर चुका हूं मुझे हुंड देश से ले जाओ इसके बाद मालूशाही के मामा मृत्यु सिंह और बाबा गोरखनाथ ने हुंड पर पराक्रम कर वहां के राजा को मार दियाl बोक्साडी विद्या से बाबा गोरखनाथ ने मालूशाही को जिंदा कर दिया इससे पुन: राजुला और मालूशाही का मिलन हुआl
Note- इस समय दिल्ली में तुगलक वंश की सत्ता थी!
6-कत्युरी वंश:- यह राजवंश भारत के उत्तराखंड राज्य का मध्ययुगीन राजवंश था इसे उत्तराखंड का पहला राजवंश कहा जाता हैl कुछ इतिहासकार इन्हें कुषाणो का वंशज मानते थे! तथा कुछ इतिहास का इन शासकों को शालिवाहन शासक(अयोध्या)के वंशज मानते थे और इसलिए यह राजा सूर्यवंशी थे!
7-तुगलक वंश- इनका शासनकाल 1320 से 1398 ईसवी तक रहा था इनका प्रथम शासक गयासुद्दीन तुगलक था तुगलकाबाद नगर की स्थापना की थी! यही इन्होंने 56 कोड नाम का एक दुर्ग भी बनाया!
इसके बाद जूना खां (मोहम्मद बिन तुगलक) दिल्ली की गद्दी में बैठा जो सबसे विद्वान सुल्तान माना जाता है! इसे स्वप्नशील पागल रक्त पिपासु राजा भी कहा जाता है! कृषि के विकास के लिए इतने अमीर ए कोही नामक नवीन विभागीय बनाया था! रेहला नामक पुस्तक के लेखक इब्न बतूता इसी के शासनकाल में आया था किस वंश का अंतिम राजा नसरुद्दीन मोहम्मद तुगलक था!
पिथौरागढ़ के राजबार शाही-
1-अस्कोट कि राजबार शाही:- कत्यूरी राजवंश के वंशज पाल शासकों ने अस्कोट में शासन किया इस वंश का प्रथम शासक अभय पाल था 1924 में अस्कोट में राजशाही के खिलाफ आंदोलन शुरू हुआ इससे अस्कोट आंदोलन भी कहा जाता है!
अस्कोट राजबारशाही की जानकारी के स्त्रोत:-
1238 का नागपाल का उक्कुलेख जो वर्तमान में नेपाल में है
1353 का निर्भय पाल का वत्युली(थल) ताम्रपत्र
1394 भारती पाल का घुन्सेरा ताम्रपत्र
1622 का महेंद्र पाल का सिंगाली ताम्रपत्र
कर व्यवस्था:-
हिलपानी धूल:- कीचड़ धूल से बचने के लिए सड़कों हेतु लिया जाने वाला करl
शोल:-जल्लाद हेतु लिया जाने वाला करl
शाउलि:-ताम्र पत्र बनाने हेतु लिया जाने वाला करl
परी- राज महल के पहरी हेतु लिया जाने वाला कर
रोउक:-शाही सेवकों हेतु लिया जाने वाला कर
विसौदी:-बेगार हेतु लिया जाने वाला कर
मणिकोट रजबार शाही:- इस वंश का प्रथम शासक राजा करमचंद था इस वंश की जानकारी हमें मुख्य स्रोतों से मिलती है:-
1610 ईसवी का पृथ्वीराज चंद्र का अठीगाव (गणाई-गंगोली) का ताम्रपत्र
रामचंद्र देव का जान्हवी नौला शिलालेख
गंगोलीहाट का भुवनेश्वर लेख
1352 का बैजनाथ मंदिर का शिलालेख
1597 का आनंद चंद्र का किरौली ताम्रपत्र बेरीनाग का
सोर के बम-वर्तमान महाविद्यालय एवं राजकीय इंटर कॉलेज परिषद को घुड़साल कहा जाता था जो संभवत बमों का अस्तबल था वर्तमान में पौण व पपदेव का क्षेत्र उच्च कोट कहलाता था जिसके ऊपर का टीला बम शासकों का आवास था उसे उदयपुर कहा जाता था l
इस वंश का प्रथम राजा कराकील को माना जाता हैl इस वंश की जानकारी मुख्यतः निम्न स्त्रोतों द्वारा मिलती है-
उदयपुर का अवशेष
रावल पट्टी में हाट गांव में बना एक हाथ नौला(हाट नौला,रानी का नौला)
विजयबम एवं ज्ञानचंद्र का सेलौनी ताम्रपत्र
विजयबम का मझेडा ताम्रपत्र
रतंगली कर:- मुनाकोट ताम्रलेख मैं उल्लेखित कर है जो चंद्र काल में लेखकों हेतु लिया जाता था l
क्षेत्रफल:- पिथौरागढ़ का क्षेत्रफल 7090 वर्ग किलोमीटर है क्षेत्रफल की दृष्टि में इसका स्थान तीसरा है!
ग्रामीण क्षेत्रफल 7073.5 वर्ग किलोमीटर शहरी क्षेत्रफल 16.5 वर्ग किलोमीटर है!
Note- उत्तराखंड का क्षेत्रफल 53483 वर्ग किलोमीटर है क्षेत्रफल की दृष्टि में उत्तराखंड का 19वां स्थान है! भारत के क्षेत्रफल का 1.69% उत्तराखंड का क्षेत्रफल हैl
सीमा रेखा:- अंतर्राष्ट्रीय सीमा चीन नेपाल के साथ तथा आंतरिक सीमा चमोली अल्मोड़ा बागेश्वर चंपावत से लगती हैl
Note- उत्तराखंड में सबसे लंबी अंतरराष्ट्रीय सीमा रेखा बनाने वाला जिला हैl उत्तराखंड की चीन के साथ सीमा 350 किलोमीटर व नेपाल के साथ सीमा 275 किलोमीटर है l
विधानसभा क्षेत्र:- धारचूला डीडीहाट पिथौरागढ़ गंगोलीहाट(अनुसूचित जाति हेतु)
Note- उत्तराखंड में विधानसभा सीटें 70 और एक एंग्लो इंडियन समुदाय द्वारा चुना जाता है! वर्तमान में उत्तराखंड का एंग्लो इंडियन सदस्य जारज आईवान गरेगरी मैन है और प्रथम एंग्लो इंडियन सदस्य आरवी गार्डन थे सबसे अधिक विधानसभा क्षेत्र हरिद्वार(11) मे है वह सबसे कम विधानसभा क्षेत्र रुद्रप्रयाग बागेश्वर चंपावत(2) में हैl
तहसीले:-पिथौरागढ़ मुनस्यारी धारचूला डीडीहाट गंगोलीहाट बेरीनाग बंगापानी देवलथल कनालीच्छीना थल तेजम पाखु(उपतहसील)
Note- उत्तराखंड में 110 तहसीलें है सबसे अधिक तहसीलें अल्मोड़ा पिथौरागढ़ चमोली पौड़ी(12) में है वह सबसे कम रुद्रप्रयाग(4)में हैl
विकासखंड- मुनाकोड कनालीच्छीना बेरीनाग गंगोलीहाट डीडीहाट मुनस्यारी धारचूला विण
Note- उत्तराखंड में ब्लॉकों की संख्या 95 है सबसे अधिक ब्लॉक पौड़ी गढ़वाल(15) व सबसे कम बागेश्वर रुद्रप्रयाग(3) में है!
जनसंख्या घनत्व- पिथौरागढ़ का जनसंख्या घनत्व 69 है उत्तराखंड में इसका 11 स्थान है l
Note- उत्तराखंड का जनसंख्या घनत्व 189 है सबसे अधिक जनसंख्या घनत्व हरिद्वार का है वह सबसे कम जनसंख्या घनत्व उत्तरकाशी का है जनसंख्या घनत्व में उत्तराखंड का 25 वा स्थान हैl
जनसंख्या- पिथौरागढ़ की जनसंख्या 483439 हैl उत्तराखंड की जनसंख्या का 4.79% पिथौरागढ़ में निवास करते हैं l इसमें ग्रामीण जनसंख्या 413834 वह शहरी जनसंख्या 69605 हैl जनसंख्या की दृष्टि से पिथौरागढ़ का आठवां स्थान हैl
Note- उत्तराखंड की जनसंख्या 10086292 हैl सबसे अधिक जनसंख्या हरिद्वार की है और सबसे कम जनसंख्या रुद्रप्रयाग की है जनसंख्या की दृष्टि में उत्तराखंड का 20 स्थान है l उत्तराखंड की जनसंख्या भारत की जनसंख्या की 0.83% है l
साक्षरता- पिथौरागढ़ की साक्षरता 82.92% है इसका चौथा स्थान है! इस में पुरुष साक्षरता 92.75 व महिला साक्षरता 70.29% हैl
Note- उत्तराखंड की साक्षरता 78.82% है l तथा महिला साक्षरता 70.70% वह पुरुष साक्षरता 87.40% हैl कुल साक्षरता में उत्तराखंड का स्थान 17वा तथा पुरुष साक्षरता में तेरवा व महिला साक्षरता 20वां स्थान है l उत्तराखंड का सबसे साक्षर जिला देहरादून व सबसे कम साक्षर जिला उधमसिह नगर है सबसे अधिक पुरुष साक्षर जिला रुद्रप्रयाग व सबसे अधिक महिला साक्षरता वाला जिला देहरादून हैl सबसे कम साक्षरता वाला जिला उधम सिंह नगर वह सबसे कम पुरुष साक्षरता वाला जिला हरिद्वार व सबसे कम महिला साक्षरता वाला जिला उत्तरकाशी है!
लिंगानुपात- पिथौरागढ़ का लिंगानुपात 1020 है लिंगा अनुपात में इसका स्थान 7 है तथा बाल लिंगानुपात 816 हैl
Note- उत्तराखंड का लिंगानुपात 963 है लिंगानुपात में इस का तेरवा स्थान है सबसे अधिक लिंगानुपात अल्मोड़ा का है तथा सबसे कम लिंगानुपात हरिद्वार का है!उत्तराखंड का बाल लिंगानुपात 908 है सबसे अधिक बाल लिंगानुपात अल्मोड़ा का और सबसे कम बाल लिंगानुपात पिथौरागढ़ का है!
गुफाएं:- पाताल भुवनेश्वर,सुमेरू,राजारानी,नागधरौड की गुफा,भवानी उडियार,भाटकोट कि गुफा,कपिलेश्वर कि गुफा,कुचियादेव गुफा,व्यास गुफा,सिर गुफा,मैलचोरा, गुप्तगंगा दानेश्वर,भोलेश्वर शैलेश्वर भरत मुक्तेश्वर,चमडुंगरा सुमेरु डाणेश्वर भरम्य छीनी गुफा पिंखु गुफा बरम उडियार गल्छिया(मालपा)शैमणा
गुफा l
महत्वपूर्ण तथ्य:-
पाताल भुवनेश्वर की गुफा गंगोलीहाट में स्थित है यहां 33 प्रकार के सभी देवी देवता निवास करते हैं l
सैमणा गुफा धारचूला से होने वाली चिपला केदार यात्रा के मार्ग में पढ़ती हैl
आठ ताम्र आकृतियां बनकोट क्षेत्र पिथौरागढ़ से प्राप्त हुई हैl
झीले झरने ग्लेशियर:-छिपला कुंड,गौरी कुंड पटौज कुंड ककरौल कुंड पार्वती कुंड मौताड कुंड थामली कुंड परी कुंड पार्वती ताल गरम पानी, विरथी फॉल किमसेन छीड राथी झरना जयौरुथा झरना गराऊ घाट मदकोट माहेश्वरी कुंड राकस ताल महेश्वर ताल गरुड जलप्रपात धमोरी ताल टोटानौला मिलम रालम पोटिंग कालापानी हीरामणि म्पौला सोना कालबलन् पिनौला नामिक पांछू बाल्टी फौलिडकौड
महत्वपूर्ण तथ्य-
मिलम गलेशियर से गोरी नदी निकलती है! यह मुंस्यारी के मिलन गांव में स्थित है जो पिथौरागढ़ का सबसे आखरी गांव है यह कुमाऊं क्षेत्र का सबसे बड़ा ग्लेशियर है 1962 में चीन युद्ध के बाद इसे बंद कर दिया गया था 1994 फिर खोल दिया गयाl
उत्तराखंड में ग्लेशियर को बमक तथा पिथौरागढ़ में हयुं-गल कहा जाता है!
गौरीकुंड रुद्रप्रयाग जनपद में भी स्थित है!
विरथी फॉल 126 मीटर ऊंचा झंडा जो मुंस्यारी में स्थित है!किमसेन छीड एलागाड नदी बारहमासी गिरता हैl भेलिया कि छीड एक हथिया देवाल के निकट थल में स्थित है!
बुग्याल:- धनिया बुग्याल दारमा बुग्याल बरम बुग्याल छियालेख बुग्याल थाला बुग्याल छिपलाकोट बुग्याल
पिंडारी बुग्याल नामिक बुग्याल जोहार बुग्याल खलिया टॉप बुग्याल रहाली बुग्याल लडीपांगती
दर्रे- पिथौरागढ़ में कई दर्रे स्थित है जो जिले व अंतरराष्ट्रीय लाभ मे महत्वपूर्ण भूमिका निभाते हैं इनमें से कुछ दर्रे निम्नलिखित है:-
तिब्बत व पिथौरागढ़ के बीच दर्रे- लिपुलेख गूंजी दारमा नवीधूरा मांसया लम्पिया ऊटाजयंती लेवीधुरा
Note:-लिपुलेख दर्रा ट्राप जक्शन दर्रा है जो चीन नेपाल भारत के बीच है इसे कुंजी दर्रा भी कहा जाता है यह दर्रा कैलाश मानसरोवर के लिए प्रसिद्ध है 2015 में भारत चीन के मध्य लिपुलेख समझौता हुआ! जिसका विरोध नेपाल ने किया!
पिथौरागढ़ व चमोली के मध्य स्थित दर्रे- लातूधूरा टोपीधूरा बाराहोती मार्चयोक
पिथौरागढ़ के स्थानीय दर्रे- धारमिला नामा खदिया जैंतीधुरा गयौगाड सिनला गुलैला
Note- सिनला दर्रा राज्य का दूसरा सबसे बड़ा दर्रा है जो दारमा तथा व्यास घाटी को जोड़ता है!
लासपा दर्रा पिथौरागढ़ व चंपावत को आपस में जोड़ता है!
टेलपास दर्रा बागेश्वर व पिथौरागढ़ को आपस में जोड़ता है इसे पिंडारी कांड के नाम से भी जाना जाता है इस दर्रे की खोज 1930 में ट्रेल ने की थी यह दर्रा नंदाकोट व नंदा देवी पर्वत को जोड़ता है।
पिथौरागढ़ में स्थित प्रमुख किले- पिथौरागढ़ में काफी प्राचीन किले स्थित हैं जिनमें से कुछ महत्वपूर्ण निम्नलिखित हैंl
डंगरकोट किला
विलकीगढ किला
उदयकोट किला
उच्चाकोट किला
बाउलकीगढ का किला- इस किले को गोखाओ ने बनाया था जिसे लंदन फोर्ट या सिमल गढ़ का किला भी कहते हैंl
सिराकोट का किला
अस्कोत का किला
पिथौरागढ़ की प्रमुख नदियां- पिथौरागढ़ में काफी नदिया है जिनमें से कुछ नदिया प्रमुख हैं वह निम्नलिखित है-
पूर्वी धौलीगंगा- 92किलोमीटर लंबी यह नदी दारमा घाटी (गोवानखना हिमनद) से निकलती है इसकी प्रमुख सहायक नदियां लिस्सर नदी महादेव गाड नागलिंग यांग्टी, नन्दर्मा सेला यांग्टी न्यूलागाड कन्चयूति गाड आदि है। इसमें धौली गंगा जल विद्युत परियोजना, चुंगर चाल परियोजना, सेला उरथिग सोबला परियोजना, बोकांग बेलिंग परियोजना आदि जल विद्युत परियोजनाएं हैंl
महत्वपूर्ण तथ्य:- धौली गंगा जल विद्युत परियोजना 280 मेगावाट की है यहां पर योजना रन ऑफ रिवर पद्धति पर आधारित है इस हेतु छिरकीला कस्बे पर डैम बनाया गयाl
Note- लिस्पर एवं दारमा नदी मिलने से धौली नदी कहलाती है जो तवाघाट खेला गांव में काली नदी से सम्मिलित होती है। धौली गंगा की लंबाई 94 किलोमीटर है धौलीगंगा को विष्णु गंगा भी कहते हैं जो देवगन हिमानी से विष्णुप्रयाग तक बहती है विष्णुप्रयाग में यह अलकनंदा नदी से मिलती है!
गौरी नदी: मिलम ग्लेशियर(मल्ला जोहर क्षेत्र)से निकलने वाली यह नदी काली गंगा की सबसे लंबी नदी है यह 104 किलोमीटर लंबी है जो जौलजीबी पिथौरागढ़ में काली नदी से मिलती है इसके तट पर जौलजीबी मेला भी लगता है! इस की सहायक नदियां शुनकलपा(रालम)नदी रमलगाड मदकानी,गोन्खागाड ,रौन्टीगाड, गोसीगाड आदि नदियां हैl इसमें गौरी गंगा परियोजना कर परियोजना करमोली लुमटी तलली परियोजना, रूसियाबगड-खसियाबाडा परियोजना260mw. मुख्य हैl
Note- जौलजीबी मेला 3 देशों की संस्कृति का मुख्य केंद्र है जिसमें देश भारत चीन नेपाल आते हैं यह मेला 10 दिन का होता है यह मेला सर्वप्रथम 14 नवंबर 1914से अस्कोट के पाल तालुकदार स्वर्गीय राजेंद्र बहादुर पाल द्वारा शुरू किया गया इन्होंने ही यहां अन्नपूर्णा देवी तथा जौलेश्वर महादेव के मंदिर का निर्माण करवाया था 2007 में इस मेले को पर्यटन एवं संस्कृति मंत्रालय ने गोद ले लिया 2014 में इसे 100 वर्ष होने पर राजकीय मेला घोषित किया गयाl गोरी गंगा नदी रालम व शुनकल्पा गाडो से मिलकर बनी है!
Doubt- उत्तराखंड में कई मेलो को राजकीय मेला घोषित किया गया है जिनमें से कुछ मेले निम्नलिखित है- बूढ़ा केदार में बाल गंगा व भिलंगना तट पर लगने वाला गुरु कैलापीर मेला को 2018 में त्रिवेंद्र सिंह रावत ने राजकीय मेले के रूप में घोषित किया और बालगंगा महाविद्यालय सिंदूल को राजकीय महाविद्यालय का दर्जा दिया!
2019 में अगस्त मुनि ब्लॉक रुद्रप्रयाग में धनपुर वह रानीगढ़ के ग्रामीणों के आस्था की देवी मां हरियाली के मंदिर में लगने वाले मेले राजकीय मेला घोषित किया गया!
138 वर्ष पूरा करने पर गैदीं मेले को भी राजकीय मेला घोषित किया गया व माघ मेला उत्तरकाशी को भी राजकीय मेला घोषित किया गया! ऐसे कई मेले हैं जिन्हें राजकीय मेला घोषित किया गया है!
काली नदी:- 11467 वर्ग किलोमीटर बेसिन क्षेत्रफल की 252 किलोमीटर लंबी काली नदी पिथौरागढ़ से सुदूर उत्तर में तिब्बत बॉर्डर के पास स्थित जैकसर श्रेणी के पूर्वी ढाल पर लिपुलेख के पास स्थित कालापानी (व्यास आश्रम)नामक स्थान से निकलती है स्थानीय भाषा में इसे कालापानी गाड या काली गंगा कहा जाता है यह नदी काकागिरी पर्वत के समांतर तथा भारत नेपाल का बॉर्डर बनाते हुए बहती है पिथौरागढ़ के बाद यह चंपावत में प्रवेश करती है और टनकपुर के निकट स्थित पूर्णागिरि तीर्थ के पास ब्रह्मदेव मंडी के बाद शारदा के नाम से नेपाल में प्रवेश करती है स्कंद पुराण में इसे श्यामा नदी कहा गया है इसके जल को अपवित्र बताया गया है! इसकी सहायक नदी गौरी गंगा सरयू लोहावती लधिया पूर्वी धौलीगंगा कुठीयांगटी एलागाड कूलागाड नदिया हैl नदी की मुख्य जल विद्युत परियोजनाएं गरबा तवाघाट परियोजना 630mw तालेश्वर परियोजना है!
Note:- काली नदी उत्तराखंड की सबसे लंबी नदी है जिस की सबसे बड़ी सहायक नदी सरयू है तथा अंतिम सहायक नदी लधिया है तालेश्वर मंदिर (पिथौरागढ़) काली तथा कुटीपानीगाड के संगम में बसा हैl
महत्वपूर्ण तथ्य- कुमाऊ की आपवित्र नदी काली नदी को माना जाता है तथा गढ़वाल की आपवित्र नदी नंदाकिनी नदी को माना जाता है इन दोनों काजल भगवान को नहीं चढ़ता है कुमाऊ की सबसे पवित्र नदी सरयू नदी को तथा गढ़वाल की सबसे पवित्र नदी भागीरथी नदी को माना जाता है
कुटियांगटी नदी- कुटी नामक स्थान पिथौरागढ़ से यह नदी निकलती है यह काली की सहायक नदी है जो निहाल गुंजी में काली नदी से मिलती है इसकी सहायक नदी थुमका निर्कुट सांगचुम्ना आदि है!
एलगाड:-छिपला केदार क्षेत्र से निकलकर एला गाल नामक स्थान पर काली नदी से मिलती हैlयहां ऐलागाड परियोजना भी है!
Note- छिपला केदार मुंस्यारी व धारचूला के लोगों के लिए हरिद्वार के समान पवित्र है!
कुलागाड:-कुला नामक स्थान पर काली नदी से मिलती हैl यहां पर कुला परियोजना भी है!
पुर्वी रामगंगा:- पूर्वी रामगंगा नामिक ग्लेशियर से निकलती है जो रामेश्वर में सरयु से मिलती हैl इसकी लंबाई 108 किलोमीटर हैl स्कंद पुराण में इसे राठवाहनी भी कहा गया है! इसमें बालगाड,फुलियाबगड़,बुर्थिग जल विद्युत परियोजना है.
Note- रामेश्वरम शिव की आराधना के लिए प्रसिद्ध है मान्यताओं के अनुसार यहां रामेश्वर गिरी नाम के साधु ने आराधना की थी जिस कार्य से रामेश्वरम कहा जाता है यहां रामेश्वरम मंदिर के लिए दान 1604 में उघोतचद्र ने दी थी रामेश्वरम पूर्व उत्तर कुमाऊ का सबसे बड़ा श्मशान घाट भी हैl
पिथौरागढ़ में आकर्षण का केंद्र- मिनी कश्मीर के नाम से प्रसिद्ध पिथौरागढ़ में आकर्षण के काफी केंद्र हैं जिनमें से कुछ मुख्य हैं जो निम्नलिखित है-
कैलाश मानसरोवर यात्रा- 40 दिन की यात्रा जुलाई से सितंबर तक चलती है इस यात्रा को कुमाऊँ विकास निगम भारतीय विदेश मंत्रालय व Itbp के सहयोग से कराई जाती है पहले यह यात्रा मुनस्यारी जोहर व नीति दर्रे से होकर जाती थी 1981 में चीन ने लिपुलेख से यात्रा की मंजूरी दी यह यात्रा अल्मोड़ा कौसानी डीडीहाट से धारचूला धारचूला से तवाघाट व लिपुलेख से तिब्बत तक जाती है
गंगोलीहाट-शैलदेश के नाम से प्रसिद्ध यह ललितसुरदेव पुत्र सुजान देव ने बसाया lयहां जमणकोट व मणिकोट नामक दो प्राचीन के लिए भी है हैं!
चौकोडी- यह स्थल सौर क्षेत्र में चाय बागवान व फलोद्यान के लिए प्रसिद्ध है! यहां कस्तूरी मृग फार्म भी हैl
हिलजात्रा- वर्षा की समाप्ति वह भादो माह में कीचड़ की यात्रा है जो कृषि तथा पशु चारों को से संबंधित मानी जाती है नेपाल में इसे इंद्र जात्रा व धान की खेती से जोड़ा जाता है यह मास्क ओपेरा की बूकी व मुखौटा नृत्य के समान है! इसमें पात्र लखिया भूत एक नेपाली राजा एक नायक भालू हिरण आदि पात्र होते हैंl
एक हथिया देवाल- तीर्थ मलिक का वह माल तीर्थ के नाम से प्रसिद्ध यह शिवालय उत्तर भारत का एकमात्र राक टेंपल है यह नागर व लैटिक शैली में बना है यह रामगंगा वह बालती नदी के संगम पर बल्तिर व अल्मिया गांव के मध्य हैl
डीडीहाट- दिगतड की चोटी में बसा यह बजारी शहर प्राचीन काल दिगतड के नाम से जाना जाता था यहां के प्राचीन मंदिर वह किलो के अवशेष से सिरा के तत्कालीन रैका राजाओं के द्वारा बनाए गए हैं इनका पता चलता हैlदिगतड पहाड़ियों से ही चरमा व भदीगाड बहती हैl
मुनस्यारी- तिकसेन प्राचीन नाम से जाने जाने वाला यह क्षेत्र जोहरियों के आयात निर्यात का केंद्र था यह शहर रामगंगा की घाटी में बसा है मुनस्यारी को ही जोहरियो का प्रवेश द्वार भी कहते हैंl
नारायण आश्रम- मौनी बाबा (नारायण स्वामी) द्वारा बनाया गया यह आश्रम कुशाल सिंह द्वारा दी गई जमीन मे बना हैl यह आश्रम 26 मार्च 1936 में बना था!
Note- नारायण स्वामी कर्नाटक से थे जिनकी मृत्यु कोलकाता में 9 नवंबर 1956 में हुई!
अस्कोट आराकोट यात्रा:- नैनीताल की पहाड़ संस्था द्वारा 1974 से प्रत्येक 10 वर्ष इस यात्रा का आयोजन किया जाता हैl
हाट कालिका मंदिर- कुमाऊँ रेजीमेंट की आस्था व विश्वास का केंद्र है यह शक्तिपीठ शंकराचार्य जी ने बनाई है हाट कालिका मंदिर के पास रुद्र कुंड है जिसमें कई बकरों की बलि दी जाती है!
धुरा मंदिर- धारचूला में स्थित दडया मंदिर के नाम से जाना जाने वाला यह मंदिर संतान प्राप्ति के लिए बहुत अधिक प्रसिद्ध हैl
मास्टरजी म्यूजियम- शेर सिंह पागंती द्वारा बनाया गया निजि संग्रहालय टाइबल हेरीटेज म्यूजियम के नाम से जाना जाता हैl
पिथौरागढ़ के प्रमुख मंदिर- आस्था की दृष्टि से पिथौरागढ़ काफी संपन्न जिला है जहां काफी मंदिर स्थित है जिनमें से कुछ निम्नलिखित हैl
ध्वज का खण्डेनाथ मंदिर नाथ मंदिर- यह एक गुफा मंदिर है जो भगवान शिव को समर्पित है कपाडी लोगों ने इसे ध्वज मंदिर का नाम दिया थाl
जयन्ती मंदिर- इस मंदिर को धर्म मंदिर के नाम से भी जाना जाता है इस मंदिर की पहाड़ियों की चोटी से पंचाचुली व नंदा देवी पर्वत स्पष्ट रूप से दिखता है!
कपिलेश्वर मंदिर- घुमावदार शिव गुफा मंदिर है एक कहावत बहुत प्रसिद्ध है की यह गुफा काशी तक जाती है।
Note- एक पुरानी कहावत है कि यहां ऋषि कपिल ने यज्ञ किया था!
थलकेदार- यहां मंदिर अस्कोट राजा खड़क पाल ने बनाया था इसके पास खडकू नौला है यह स्थान बम शासकों का शिकार का स्थान था! नकुलेश्वर मंदिर व अंकोरो से पैदल चलकर मंदिर में पहुंच सकते हैंl
Note- थल केदार को केदारजयू भी कहा जाता हैl
घुन्सेरा मंदिर- कोट माई का ऐतिहासिक गुफा मंदिर हैl इसी के पास में असुरचुला मंदिर हैl यहां स्थित भगवान व देवी की मूर्ति कार्तिकेयपुर के खोल राजाओ ने स्थापित की थीl
Note- यहां स्थित दो मूर्तियां गुप्त कला का उदाहरण हैl
चौपखिया मंदिर-चौमू देवता को भगवान शिव का अवतार माना जाता है यह मंदिर वड्डा ग्राम में है चौमू को पशु चारक वर्ग का देवता व पशुधन का रक्षक भी माना जाता है नवरात्रि मे यहां मेला लगता है जिस मेले में कृषि उपकरणों की बिक्री काफी अधिक होती है पहले यहां नेपाली लोग काफी आते थे परंतु वर्तमान में नेपाली लोगों की संख्या थोड़ा कम हुई है परंतु कृषि उपकरणों की बिक्री में कोई प्रभाव नहीं पड़ा हैl
पौराणिक किस्सा:- इस क्षेत्र में एक दानव रहता था जो यहां के व्यक्तियों को बारी-बारी से खाता था जिससे परेशान होकर लोगों ने चौमू देवता की आराधना की चौमू देवता ने अपना दूध लाटा देव यहां भेजाl दानव व लाटा देव के बीच युद्ध हुआ जिसमें दानव ने लाटा देव की जीप काट दी जिस कारण इन्हें लाटा देव कहा गया चौमू देवता के मंदिर के बगल में ही लाटा देव वा मां भगवती का मंदिर भी हैl
चामुंडा मंदिर- पिथौरागढ़ में चंड मुंड को मारने वाली देवी चामुंडा का भव्य मंदिर भी हैl
मड का सूर्य मंदिर- कटारमल सूर्य मंदिर के समान ही डीडीहाट में स्थित मड का सूर्य मंदिर है! परंतु कुछ प्राकृतिक कारणों के कारण यह मंदिर अपनी पहचान खो रहा है और नष्ट होने की कगार में जाने लगा है यह मंदिर एक ओर को झुकने लगा है और जिस कारण मुख्य कक्ष में पूजा करने में लोग भयभीत होते हैंl इस मंदिर के अंदर साथ रथ वाला सूर्य की मूर्ति व अंदर भगवान विष्णु शिव पार्वती लक्ष्मी की मूर्ति भी हैl
पौराणिक कहावते- यह मान्यता है कि जब पांडव स्वर्गारोहण की ओर जा रहे थे वह मड में रुके और द्रोपति के आगह में इन्होंने यहां मंदिर बनाया और बाद में कत्यूरी राजाओं ने इसे पुनः निर्माण किया!
दुगई आगर सूर्य मंदिर- गंगोलीहाट तहसील के अंतर्गत दुगई में सूर्य मंदिर है यहां सूर्य की जाग का भाग एक ईट से बनाया गया है यह कहा जाता है कि यह मंदिर मूल ना होकर ग्रामीण वासियों द्वारा इसे अपने ढंग से नवनिर्मित किया है इस मंदिर के गर्भ घर में तीन सूर्य देवता की मूर्तियां व अन्य देवी-देवताओं की मूर्तियां हैl
इसे भी जाने- वर्तमान में दुगई सूर्य मंदिर को स्थानीय शिव मंदिर के नाम से पुकारते हैं इसी के पास दुगई आगर विष्णु मंदिर है जो प्राकृतिक सुंदरता के लिए बहुत प्रसिद्ध है यहां रक्षाबंधन के समय विशाल मेला लगता है और श्रद्धालुओं की काफी भीड़ देखने को मिलती हैl
मोस्टमानु मंदिर :- इंद्र पुत्र के नाम से प्रसिद्ध मोस्ट देवता को शिव के समान माना जाता है तथा इन्हें वर्षा के देवता के रूप में पूजा जाता है यहां हर 16 सितंबर को मेला लगता है जिसमें काफी श्रद्धालु हिस्सा लेते हैंl कुछ जन सूक्तियां यह भी है कि यह कालिका के पुत्र थेl
मान्यता- मोस्टमानु मंदिर ने वैज्ञानिक अनुसंधानओं को भी फेल कर दिया यहां मेले के दिन एक पत्थर है जिसे उठाना बहुत कठिन है परंतु सच्ची शरदा और ओम नमः शिवाय के जाप से इसे उंगलियों में उठाया जा सकता है यदि शिव का जाप नहीं किया गया तो इसे उठाना असंभव है ऐसी यहां की मान्यता हैl
अर्जुनईश्वर मंदिर:- पांडव पुत्र महान धनुर्धर अर्जुन द्वारा यहां मंदिर बनाया गया है पिथौरागढ़ से 10 किलोमीटर पैदल दूरी तय कर इस मंदिर तक पहुंचा जाता हैl
Note- अर्जुन ईश्वर मंदिर भगवान शिव को समर्पित एक मंदिर हैl
उल्का देवी- गोरखाओं ने कुलदेवी उल्कादेवी को मानते हुए मां उल्का देवी का एक भव्य मंदिर पिथौरागढ़ में बनाया थाl जिस का पुनः निर्माण का श्रेय और भव्य रूप देने का सराय यहां के सेरा गाव के मेहता परिवार को जाता है l
कहावत- कैप्टन शेर सिंह मेहता ने इस मंदिर में संतान प्राप्ति की आराधना की थी संतान प्राप्ति के बाद उन्होंने ही सबसे पहले इस मंदिर के निर्माण में दान किया था और इन्हें ही इस मंदिर को भव्य रूप देने का श्रेय जाता हैl
Note- स्याकोट बागेश्वर मे भी मां उल्का देवी का एक भव्य मंदिर है जिसे यहां भगवती मां के रूप में पूजा जाता है और इस क्षेत्र की रक्षिका के रूप में जाना जाता हैl
Note- लोगों के कहावत के अनुसार बागेश्वर की उल्का देवी मंदिर को बनाने का श्रेय यहां के मेहता लोगों को जाता हैl
नकुलेश्वर मंदिर- शिलिंग गांव में खुजराहो स्थापत्य शैली का श्रद्धालुओं की आस्था का एक मुख्य केंद्र है यहां शिव पार्वती उमा वासुदेव 9 वर्ग सुर्य महिषासुर मर्दिनी वामन कर्मा नसिंह समेत 38 हिंदू देवी देवताओं की मूर्ति हैl
कहावत- कहावत के अनुसार महाभारत युद्ध के दौरान पांडव पुत्र नकुल यहां अपने सैन्य शिविर के साथ रुका और उसने यहां शिव की मूर्ति स्थापित की जिस कारण इसे नकुलेश्वर महादेव मंदिर भी कहते हैंl
पिंगली नाग मंदिर-थल के पास बरसायत गांव में पिंगल नाग नाम का एक सदाबहार नौला है कहावत के अनुसार यह एक नाग नौला है जिस कारण इसका पानी कोई कोई प्रयोग नहीं करता है इस इलाके का वर्णन पुराणों में भी मिला है इसके अनुसार इस क्षेत्र में 11 नाग मंदिर स्थित है इनमें से पांखु गांव में बसा पिंगला मंदिर यहां के लोगों का आस्था का बहुत बड़ा केंद्र है यहां के लोग गाय भैंस की दूध का पहला अभिषेक पिंगली देव को ही कराते हैं तथा पहली फसल का भी अभिषेक पिंगली नागदेव को कराते हैंl
इतिहास- द्वापर युग में कालिया नाग को श्री कृष्ण ने युद्ध में पराजित किया उसके बाद कालिया नाग अपने भाई धोलीनाग फेनीनाग बेरीनाग वासुकीनाग मुलनाग अपने राजपुरोहित पिंगलाचार्य आदि के साथ दसौली गंगावाली के निकट शिखरों में बस गएl पिंगला आचार्य को यहां के स्थानीय लोग पिंगली नाग देवता के रूप में पूछते हैं l
गुरना माता मंदिर- पिथौरागढ़ के गुरना गांव में स्थित पासन देवी का एक भव्य मंदिर है गुरना गांव में स्थित होने के कारण इसे गुरना माता मंदिर कहते हैंl यह मंदिर सड़क के किनारे है मान्यताओं के अनुसार पहले इस सड़क में काफी दुर्घटनाएं होती थी जब से इस मंदिर को सड़क के किनारे बनाया गया है तब से यहां सड़क दुर्घटनाएं काफी कम हुई है और आस्था का यह केंद्र ऐसा है कोई भी मां की सच्चे दिल से अर्चना करता है उसकी सारी मनोकामनाएं पूरी होती है l
Note- गुरना माता मंदिर को मां वैष्णो मंदिर (जम्मू कश्मीर) के समान माना जाता हैl
कामाख्या मंदिर- नारीत्व का प्रतीक यह मंदिर कासनी (कसूली) नामक स्थान पर है जिसका निर्माण 1972 में मदन शर्मा व उसके परिवार ने कराया था मान्यता के अनुसार जो भी श्रद्धालु यहां सच्ची शरदा से आता उसकी मनोकामना जरूर पूरी होती है!
Note- इस मंदिर की मुख्य शाखा असम में स्थित है यह कामाख्या माता का मात्र उत्तराखंड का एक मंदिर हैl
कोटली का विष्णु मंदिर- कत्युरी शासको द्वारा नवी शताब्दी में दक्षिण भारतीय शैली में दिंवास गांव पिथौरागढ़ में यह मंदिर बनाया गया जो सीमांत जिले का पहला राष्ट्रीय धरोहर में शामिल होने वाला मंदिर है इसे 2019 में राष्ट्रीय धरोहर में शामिल किया गयाl
Note-दिगांस अभिलेख मे कुमाऊनी भाषा का प्रथम नमूना मिला हैl कत्युरी वंश उत्तराखंड के इतिहास का स्वर्ण काल कहा जाता है जगत चंद्र के शासनकाल को भी उत्तराखंड का स्वर्ण काल कहा जाता हैl
कोटगाड़ी देवी मंदिर-पांखु(बेडीनाग) मे स्थित मां कोकिला(कोटगाडी माता) का मंदिर है इन्हें न्याय की देवी माना जाता है गोलू मंदिर की तरह यहां भी लोग अपने आरजी टांगते हैंl अन्याय के शिकार व्यक्ति के लिए यह अंतिम दिव्य न्यायालय माना जाता हैl
Note- कोडगाड़ी मैया ने कालिया नाग को भी अभयदान दिया थाl
छिपला केदार यात्रा का प्रथम पड़ाव कोकिला माता मंदिर हैl
नाग मंदिर- पिथौरागढ़ के बेरीनाग में स्थित यह मंदिर यहां की आस्था का बहुत बड़ा केंद्र है लोगों का मानना है की कालिया नाग और उसके अन्याय यहीं आकर बसे थे इस मंदिर के बनने के विषय में अलग-अलग मत मिलते हैं कुछ लोगों का मानना है महाराष्ट्र के पंत जी यहां आए उन्होंने कई नाग देखें और उन्होंने इनके लिए यह मंदिर बनाया जिसे नाग मंदिर का नाम दिया कुछ लोगों का मानना है नागवेणि राजा बेनी माधव ने इस मंदिर का निर्माण कराया थाl
सेरादेवल मंदिर-सेरा देवल या देवल समेत का मंदिर भडकटिया मे ठुली गाड व रंधोला नामक दो छोटी जल धाराओ के संगम मे स्थित हैl देवल समेत बाबा को शिव का अवतार माना जाता हैl देवल समेत बाबा के चार भाई वाह 22 बहने थी हर बार बाबा अपनी बहनों को चैत में बिट्रोला देते थे आस्था की यह परंपरा लोगों ने आज भी चलाई है हर चैत में बाबा का डोला निकाला जाता है यह डोला 22 गांव से गुजरता है इस डोला चैतोल कहलाता हैl और लोग स्थानीय जनता की कृषि को प्राकृतिक प्रकोप से सुरक्षा के लिए और स्थानीय लोग बाबा से प्राकृतिक प्रकोप से कृषि तथा जनता की रक्षा की प्रार्थना करते हैंl
गोम्पा बौद्ध मठ- पिथौरागढ़ में महात्मा बुद्ध का एकमात्र मंदिर है इसे बुद्ध टेंपल भी कहते हैं बौद्ध धर्म के अनुयाय इसे गोम्पा कहते हैं यह एक साथ वातावरण में स्थित है 1995-96 में लद्दाख से लामा रिगंजिग अपने परिवार के साथ पिथौरागढ़ उन्हें पिथौरागढ़ इतना पसंद आया कि 1999 में उन्होंने 8 नाली जमीन खरीद कर यहां यह मठ बनायाl
मां कौशल्या मंदिर- पिथौरागढ़ के पश्चिम में हुडेती व गणकोट चोटी में बसा मां कौशल्या देवी का मंदिर जो यहां के लिए चमत्कारी देवी के रूप में माना जाता हैl प्रत्येक रामनवमी मे यहां भंडारे का आयोजन किया जाता हैl
कहावत- कुछ लोगों का यह मानना है कि मां कौशल्या मानसरोवर की यात्रा के लिए जब पिथौरागढ़ से गुजर रही थी तो वह यहां रुकी जिस कारण उनका यहां मंदिर बनाया गया परंतु कुछ लोगों का यह मानना है अयोध्या के ऋषि कौशल्य जो पहले राजा थे शांति की तलाश में हिमालय की यात्रा में निकले और यहां रुके गुफा में उनको रात्रि में सपना है सपने में एक देवी आई और गुफा में अपने होने का दावा किया जब सुबह कौशल्य ऋषि उठे तो उन्होंने गुफा में मां की छायाचित्र देखी तब उन्होंने इस मंदिर को बनाया यह मंदिर आम पर्वती शैली का हैl
व्यास मुनि का मंदिर- व्यास घाटी में व्यास मुनि का आश्रम है इसके ऊपर महादेव का प्रसिद्ध मंदिर भी है शोका जनजाति के लोग वेदव्यास को अपना पूर्वज मानते हैंl
छियालेख- यह स्थल अपनी बनावट व प्रकृति सुंदरता के लिए प्रसिद्ध है यहां वर्म देवता व छेतो माटी देवता का मंदिर है जिनमें शौका जनजाति की बहुत आस्था हैl
बागनाथ मंदिर- यहां मंदिर थल में स्थित है परंतु मुख्य मंदिर बागेश्वर में स्थित हैl
Note- बागेश्वर का बागनाथ मंदिर सरयु तथा गोमती के तट पर 1602 में लक्ष्मी चंद ने नागर शैली में बनाया थाl
गबला देव- दारमा निवासी शौका जनजाति की आराध्य देव गबला देव हैंl
पिथौरागढ़ से जुड़े महान व्यक्तित्व-
कबूतरी देवी- लोक गायिका कबूतरी देवी का जन्म 1945 में काली कुमाऊं में हुआ था उनकी मृत्यु 7 जुलाई 2018 को पिथौरागढ़ में हुई तीजन बाई के नाम से प्रसिद्ध कबूतरी देवी को 2002 में छोलिया महोत्सव सम्मान व 2016 में लाइफटाइम अचीवमेंट अवार्ड मिला है थाl इन को राष्ट्रपति पुरस्कार से भी सम्मानित किया गया हैl
Note- कबूतरी देवी को कुमाऊ की कोकिला भी कहते हैंl इन्होंने आकाशवाणी में 100 से अधिक गाने गाए हैं इनके पति का नाम स्वर्गीय दीवान राम था!
प्रकाश पंत- एक कुशल राजनीतिज्ञ और निशानेबाज स्वर्गीय प्रकाश पंत जी का जन्म 11 नवंबर 1960 को पिथौरागढ़ में हुआ इनकी मृत्यु 5 जून 2019 को अमेरिका में हुई उनकी पत्नी का नाम चंद्रा पंत हैप्रकाश पंत जी अपना आदर्श पंडित दीनदयाल उपाध्याय जी को मानते थे 1977 में वह छात्र राजनीति में बहुत सक्रिय थे और वे सैन्य विज्ञान परिषद किए महासचिव भी बने तथा 1988 में नगर पालिका परिषद के सदस्य 1998 में पहली बार यूपी विधानसभा में निर्वाचित हुए 2001 में प्रथम विधानसभा अध्यक्ष 2007 मैं वह द्वितीय निर्वाचित सरकार में कैबिनेट मंत्री बने 2012 में हुए चुनाव हारे और 2017 में चुनाव जीत के फिर कैबिनेट मंत्री बने प्रकाश पंत जी राजनीति के साथ खेल व साहित्य से भी जुड़े रहे उन्होंने राष्ट्रीय निशानेबाजी में 2004 में रजत पदक जीता और इसी वर्ष राज्य स्तरीय निशानेबाजी में उन्होंने स्वर्ण पदक जीता प्रकाश पंत जी ने कई कहानियां तथा काव्य संग्रह भी लिखें एक आवाज, प्रराब्द उनके काव्य संग्रह थे व आदि कैलाश की यात्रा उनका यात्रा वृतांत था एक थी कुसुम की एक प्रसिद्ध कहानी है उनकी एक और रचना थी मैं काली नदी! प्रकाश पंत जी को 2008 में उत्कृष्ट विधायक पुरस्कार मिला और 2011 में भारत ज्योति सम्मान मिला था।
Note- प्रकाश पंत जी का आदर्श वाक्य था नर सेवा नारायण सेवा l
कुंवर दामोदर सिंह राठौर- शांतिवन डीडीहाट में रहने वाले कुंवर दामोदर सिंह राठौड़ को वृक्ष मित्र के नाम से जाना जाता है टाइम्स ऑफ इंडिया की रिपोर्ट के अनुसार इन्होंने 125 प्रजाति के 800 पौधे लगाए थे 2000 में एपीजे अब्दुल कलाम ने इन्हें प्रदर्शनी मित्र पुरस्कार दिया थाl
Note- कुंवर दामोदर सिंह राठौर ने ही द्रोपति नारी निकेतन संस्थान डीडीहाट में बनाया थाl
खड़क सिंह वल्दिया- इनका जन्म 20 मार्च 1937 को मयमार में हुआ था यह 1947 में अपने ग्रह नगर पिथौरागढ़ आए थे यहां उन्होंने गांधी बाल मंदिर पुस्तकालय खोला बाद में इसका नाम गांधी वाचन मंदिर रखा गया 1953 में जब यहां से गए तो इस पुस्तकालय को बंद कर दिया गयाl खड़क सिंह वल्दिया एक भूगर्भवेत्ता थेl 2007-8 में इन्हे हिंदी से अटूट प्रेम के लिए आत्माराम पुरस्कार दिया गया 2007 में राष्ट्रपति अब्दुल कलाम जी द्वारा इन्हें पद्मश्री दिया गया 1976 में शांति स्वरूप भटनागर पुरस्कार मिला 2012 में इन्हें जीएम मोदी पुरस्कार विज्ञान और पर्यावरण मिला 2015 में इन्हें पद्मभूषण मिला l 1983 से 1985 तक यह प्रधानमंत्री मंत्रिमंडल में वैज्ञानिक सलाहकार समिति के सदस्य रहेl
Note- आत्माराम पुरस्कार को हिंदी देवी पुरस्कार भी कहा जाता है जो भारत सरकार द्वारा दिया जाता हैl
हरि सिंह थापा- भारतीय अंतरराष्ट्रीय बॉक्सर एवं राष्ट्रीय कोच हरि सिंह थापा जी इन्हें भारतीय बॉक्सिंग का पितामह कहा जाता है इनका जन्म 14 अगस्त 1932 को झांसी उत्तर प्रदेश में हुआ यह सेना में कैप्टन पद में थे 1950 में इन्होंने राष्ट्रीय प्रतियोगिता चैंपियनशिप में भाग लिया थापा जी ने 1958 में सबसे पहले कॉमनवेल्थ व एशियाई खेल मे पदक जीता हरि सिंह थापा के इस योगदान के लिए उत्तराखंड सरकार ने 2013 में देवभूमि द्रोणाचार्य पुरस्कार दिया यह 1961 में राष्ट्रीय बॉक्सिंग टीम के कोच बने और इसके बाद इन्होंने पिथौरागढ़ में फ्री में काफी बच्चों को बॉक्सिंग की ट्रेनिंग दीl
हनसा मनराल – हनसा मनराल का जन्म 1957 को भाटकोर्ट में हुआ था यह भारत की एक भारोत्तोलक है इन्हें 29 सितंबर 2001 में द्रोणाचार्य पुरस्कार मिला यह उत्तराखंड की पहली महिला हैं जिन्हें यह पुरस्कार मिला है इनके बेटी भूमिका शर्मा अंतरराष्ट्रीय स्तर में बॉडीबिल्डिंग मिस वर्ल्ड का खिताब 2017 का 21 उम्र की आयु में जीताl
हरिदत्त कापडी- इनका जन्म 5 अगस्त 1957 में चिड़ियारवान मुवानी मैं वीर देव कापड़ी व मंदोदरी देवी के परिवार में हुआ था हरिदत्त कापड़ी जी बास्केटबॉल के प्रमुख खिलाड़ी थेl हरिदत्त जी को 1979 में अर्जुन पुरस्कार 2014 में देवभूमि लाइफटाइम अचीवमेंट पुरस्कार मिलाl
Note- 1975 के मैच के दौरान हरिदास जी थाईलैंड खिलाफ पूरी तरीके से जख्मी हो गए थे परंतु उन्होंने खेलना ना छोड़ा और अपने जज्बे से इस मैच को जीता है इस इस मैच के कारण ही उन्हें 1979 में अर्जुन पुरस्कार मिलाl
हरीश चंद्र सिंह रावत- हरीश चंद्र सिंह रावत भारतीय पर्वतारोही थे 3 जुलाई 1934 को इनका जन्म पंजाब क्षेत्र में हुआ था मूल रूप से यह सिरमोली मुनस्यारी के निवासी थे इनके पिता का नाम स्वर्गीय शेर सिंह रावत मां का नाम गंगोत्री देवी था 1952 में असिस्टेंट सब इंस्पेक्टर के पद पर नियुक्त हुए 12 वर्ष बाद ही विशिष्ट राजपत्रित अधिकारी पद पर पहुंचे 29 मई 1965 को पहले उत्तराखंडी जो माउंट एवरेस्ट में चढ़े थे 1962 में कंचनजंगा फतेह 1963 में हाथी पर्वत 1964 में राकोंग पर्वत फतेह कि वह 1984 में त्रिशूल पर्वत एवं नंदा देवी पर्वत फतेह की अपने इस हुनर के लिए उन्हें 1965 में पद्मश्री 1966 में अर्जुन पुरस्कार से नवाजा गयाl
Note- बछेंद्री पाल पहली महिला थी जिन्होंने 1984 में एवरेस्ट फतह की थीl
नैन सिंह रावत- 21 अक्टूबर 1830 मौलिक पंडित तथा देसी राज्यों का साथी के नाम से प्रसिद्ध नैन सिंह रावत का जन्म जोहरी घाटी मैं हुआ इनकी मृत्यु 1 feb. 1882 को दिल का दौरा पड़ने के कारण मुरादाबाद में हुई नैन सिंह रावत अन्वेषण करता तथा लेखन कार्यों के लिए प्रसिद्ध थेlइनकी प्रमुख पुस्तकें अक्षांश दर्पण, थारकन्द कि यात्रा ठोक जयालूंग की यात्रा प्रमुख हैं 27 जून 2014 को इनके नाम का डाक टिकट जारी हुआl
Note- शेखर पाठक तथा उमा भट्ट की पुस्तक एशिया के पीठ पर इस पुस्तक से नैन सिंह रावत जी के कई कार्यों पर प्रकाश डलता हैl नैन सिंह रावत के नाम पर कई संस्थान व संग्रहालय भी पिथौरागढ़ में बने हुए हैं जिनमें से नैन सिंह मिलन वाला पुरातत्व संग्रहालय वह नैन सिंह रावत पर्वतारोहण संस्थान प्रमुख हैl
त्रिलोक सिंह बसेड़ा- 18 अक्टूबर 1934 को भंडारी गांव देवाल्थल में इनका जन्म हुआ था इनके पिता का नाम लक्ष्मण सिंह बसेड़ा तथा माता का नाम कौशल्या बसेरा था यह सेना में ईएमआई पद में थे खेलों में उनकी विशेष रुचि थी तिलोक सिंह बसेड़ा जी फुटबॉल से संबंधित थे इन्हें आयरन बॉल ऑफ इंडिया भी कहा जाता है 2014 में इन्हें देव भूमि खेल रत्न मिला हैl
Note- 1962 में जकार्ता में हुए एशियन गेम्स में फुटबॉल टीम दक्षिणी कोरिया की टीम को 2-1 से हराया और स्वर्ण जीता इस मैच में त्रिलोक सिंह बसेड़ा जी की अहम भूमिका थीl
लव राज सिंह धर्मशक्तु- लव राज सिंह एक सफल पर्वतारोहण थे जिनका जन्म 20 मार्च 1973 को बोना ग्राम मुनस्यारी में हुआ था इन्होंने अपना प्रशिक्षण 1990 में नेहरू पर्वतारोहण से लिया था इन्होंने 7 बार माउंट एवरेस्ट की चढ़ाई की है इन्होंने माउंट एवरेस्ट पर अपनी चढ़ाई का आरंभ 1998 से किया इन्होंने 40 से अधिक पहाड़ों में चढ़ाई कर चुकेl इनकी पत्नी का नाम रीना कौशल धर्मशक्तु हैl
Note- रीना कौशल धर्मशक्तु एक सफल पर्वतारोहण थी जिनका जन्म 1970 को पंजाब में हुआ था इन ने अपना प्रशिक्षण हिमालय पर्वतारोहण संस्थान दार्जिलिंग से लिया था 2010 में उत्तराखंड से दक्षिणी ध्रुव में जाने वाली प्रथम महिला बनीl
लवराज सिंह धर्मशक्तु b.s.m. में असिस्टेंट कमांडर थे इन्हें 2014 में पद्मश्री से नवाजा गयाl
चंद्रप्रभा ऐतवाल- चंद्रप्रभा एतवाल का जन्म 24 दिसंबर 1941 को धारचूला में हुआ इनका संबंध साहसी खेलों से है जिस कारण इन्हें माउंटेन गोट भी कहा जाता हैl 1981 में अर्जुन पुरस्कार से सम्मानित किया गया 1990 में पद्मश्री से सम्मानित किया गया 1994 में इन्हें राष्ट्रीय साहसी पुरस्कार से सम्मानित किया गया तथा 2010 में इन्हें तेनजिंग नोर्गे एडवेंचर अवॉर्ड मिला
प्रभात कुमार उपरेती- पॉलिथीन बाबा के नाम से प्रसिद्ध महान पर्यावरणविद और एक महान लेखक प्रभात कुमार उपरेती जिन की कुछ रचनाएं निम्नलिखित है-
संघर्षकृत उत्तराखंड, जिंदगी मे कहानी, हिमालय को पदयात्रा, एक आदमकद इंसान, सफदर, हिमालय की पदयात्रा, पर्वत में नशा, पर्वत में पर्यावरण की कहानी, पगलाए लोग, फागु दार की डायरी, सियासत ए उत्तराखंड, उत्तराखंड की लोक एवं पर्यावरण गाथाएं
Note- श्री प्रभात कुमार उपरेती वर्तमान में विवेक विहार गैस गोदाम रोड कुसुमखेरा हल्द्वानी में रहते हैंl
लारी बेकर- इनका जन्म 1917 में इंग्लैंड में हुआ था इन्हें निर्धनों का वास्तु कलाकार कहते हैं इन्होंने झुग्गी बस्तियों के विकास कचरा निपटाना जल संग्रह भूकंप रोधी भवन की सिर्फ पर अनेक पुस्तकें लिखी है वास्तुशिल्प और समाज सेवा से जुड़े बेकर को उनके योगदान के लिए राष्ट्रीय और अंतरराष्ट्रीय पुरस्कारों व सम्मान उसे कई बार सम्मानित किया गया था अपनी पत्नी डॉक्टर एलिजाबेथ जबेल के साथ उन्होंने त्रिवेंद्रम केरल में रहने का निर्णय लियाl बड़ी कठिनाई के साथ 1989 में बड़ी कठिनाई के साथ भारतीय नागरिकता मिली वह हिंदू संस्कृति से इतने प्रभावित थे कि उन्होंने अपने बेटे का नाम तिलक तथा बेटी का नाम विद्या तथा हृदि रखा। 1990 में उन्हें पद्मश्री मिला विदेशी भूमि में जन्मे बेकर ने भारत की भूमि को अपनी कर्मभूमि बनाया और उनका यही 1 अप्रैल 2007 को 90 वर्ष की आयु में निधन हुआ!
नमज्ञा सी खम्पा- दारमा घाटी व धारचूला की बेटी के नाम से प्रसिद्ध नमज्ञा क्या राजनीति क्षेत्र से संबंधित है।भारत को संयुक्त राष्ट्र की बजट संबंधी मामलों पर सलाह देने वाली एक महत्वपूर्ण समिति के लिए निर्वाचित किया गया है। इस समिति का सालाना बजट करीब 22 अरब डॉलर है।
संयुक्त राष्ट्र के भारतीय मिशन में पदस्थ नमज्ञा खम्पा को 16 सदस्यीय एडवाइजरी कमेटी ऑन एडमिनिस्ट्रेटिव एंड बजटरी क्वेश्चन्स [एसीएबीक्यू] में तीन साल के लिए निर्वाचित किया गया है।
खम्पा ने कहा कि मैं बेहद उत्साहित महसूस कर रहा हूं। यह एक अच्छा लेकिन कठिन अभियान था जिसमें हम सबसे आगे रहे। खम्पा इससे पहले चीन, म्यामार और श्रीलंका में भारतीय मिशनों में अपनी सेवाएं दे चुके हैं।
एसीएबीक्यू के कामकाज में संयुक्त राष्ट्र के महासचिव द्वारा महासभा को सौंपे गए बजट का अध्ययन करना तथा महासभा को सौंपे गए प्रशासनिक एवं बजटीय मामलों पर सलाह देना भी शामिल है।
भारत के अलावा, एशियाई क्षेत्र के लिए चुनाव में चीन, जापान और पाकिस्तान के प्रत्याशी भी थे।
संयुक्त राष्ट्र में भारत के दूत हरदीप सिंह पुरी ने बताया कि भारत को कुल 570 मतों में से सर्वाधिक 164 मत मिले।
उन्होंने बताया हम सभी ने इसके लिए कड़ी मेहनत की। यह संयुक्त राष्ट्र की प्रतिष्ठित समितियों में से एक है क्योंकि इसके सदस्यों की जिम्मेदारी विश्व संस्था के बजट की वित्तीय जांच होती है। चुनाव में डाले गए कुल 555 मतों में से चीन को 130 मत, जापान को 147 और पाकिस्तान को 114 मत मिले। पाकिस्तान समिति से बाहर हो गया। जापान अमेरिका के बाद संयुक्त राष्ट्र में दूसरा सबसे बड़ा आर्थिक योगदानकर्ता है।
Subscribe to:
Posts (Atom)